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Sat Mar 15 05:35pm IST
Entry for March 15, 2008
कविता - प्रेमचंद सहजवाला पत्थरों के बीच से बहती हुई एक नदी बन कर तुम उतर गयी हो मेरे सीने में एक तड़प की तरह और मैं एक नाव बन कर नदी के तट से जा जा लगा हूँ. एक more